एकजुट वही हो सकता है जिसका कोई लक्ष्य हो : रोहिताश सारस्वत

गुरूग्राम। लक्ष्य सारस्वतों में से हुआ तो वह हुआ रावण का। उसने भारत की धरती पर जन्म लिया। रावण उत्तर प्रदेश के दादरी के पास गौतम बुद्ध जिला में गांव बिसरख में पैदा हुआ। जैसा कि अब जागरूकता आने के बाद पता चल रहा है कि जब वह छोटा था तब अन्य राजाओं का राज चल रहा था। उस समय सारस्वत के ऋषियों पर अत्याचार काफी अधिक हो गए। तब उसने यह सब दुख देख कर अपनी मां से सांझा किया। मां अपने पिता से कहती और पिता अपने बच्चे को समझाते। जैस आप सभी अपने एक दूसरे को समझा रहे हैं। हर बच्चा दुख देखकर अपनी मां और बाप से सांझा करता है। जब मां बाप पर इस समस्या का निराकरण नहीं होता तो वह खुद जिम्मेदारी लेता है। रावण ने भी अपने कुछ सारस्वत ब्राह्मणों को समझाना आरंभ किया और एक लाख पूत सवा लाख नाती एकत्रित कर दिये। उसके बाद वह संघर्ष कर आगे बढ़ता गया। सारस्वत ऋषियों पर बढ़ते अत्याचारों को लेकर वह सब ऋषियों के विरोध खड़ा होने लगा। यह सब जानते हुए उसके पिता विश्रृवा ने उसे दीक्षा के लिए आश्रम में भेज दिया। जहां ऋषि से रावण ने पूछा कि मुझे राजा बनना है तो वह बोले आप बन सकते हैं। उससे पहले आश्रम में ऋषियों ने रावण से कुछ प्रश्र पूछे तो रावण उनमें सफल रहा। ऋषियों ने कहा कि अतिंम क्षण में आपको परमगति को प्राप्त होना पड़ेगा। रावण ने कहा कि मुझे मंजूर है। आश्रम में ऋषि की बात सुनकर रावण को लगा की हां यहां मुझे कुछ मिल सकता है। इसलिए रावण ने जल्द ज्ञान प्राप्त कर 14 वर्ष की अवस्था में मां के कहने पर कुछ जिम्मेदारी संभाली और अपने दुश्मनों को अपने मार्ग से हटाता गया। तब पहले से चले आ रहे राजाओं पर रावण का दबाव गया तो वह सोचने लगे कि अब इसे बराबर का दर्जा देना पड़ेगा। हक रावण ने मांगना आरंभ किया तो राजाओं ने देना आंरभ किया। लेकिन जैसे जैसे रावण को राजाओं की असलियत मालूम पड़ी तब राजाओं के साथ बैठने वाले सारस्वत ऋषियों को उसने अपने साथ करना चाहा, लेकिन वह नहीं हुए। जैसे भृगु ऋषि। राजाओं के विरूद्ध जाने से भृगु ऋषि को लगा कि रावण का जन्म अभी हुआ है। इसका साथ देने से क्या फायदा। लेकिन भृगु ऋषि को रावण ने बहुत समझाया और वह नहीं माने तो रावण ने इन्हें परेशान करना आंरभ कर दिया। उसके बाद भृगुऋषि ने शाप दे दिया। शाप मिलने के बाद रावण अपने बचाव के कारण शोध कर ब्रह्मा और शंकर की अराधना करने लगा। भगवान से अराधना करके रावण ने वरदान प्राप्त कर लिया। तब रावण ने अपनी मातृ भूमि की रक्षा करने के लिए विश्व विजेता की लहर भारत से जगा दी। तब राजाओं को लगा कि यह हम से ऊपर चला जाएगा। हमें कोई नहीं जानेगा। लेकिन यह पता अवश्य होना चाहिए कि हमारा लक्ष्य क्या है। हम जिस लक्ष्य को साथ लेकर चल रहे हैं वह लक्ष्य क्या है। उस लक्ष्य से हमें कभी नहंी भटकना चाहिए। रावण ने अपना लक्ष्य साधा तो अन्य राजाओं की सोच विपरीत हो गई और रावण पर दबाव बनाना आरंभ कर दिया तो रावण ब्रहा और शंकर की अराधना करने लगा तब रावण को पता चला कि ब्रहा और शंकर से जो मैं लेना चाहता हूँ वह मुझे देने से मना कर करे हैं वह राजाओं का साथ देना चाहते हैं। इसलिए मुझे मांगे अनुसार वरदान नहीं दे रहे हैं। तब रावण अंदर ही अंदर समझा और कहा कि अब तुम्हारे पास जो था उसे मैंने प्राप्त कर लिया। उसके बाद रावण ने सोच की ऋषियों की भविष्य वाणी हो चुकी है कि इस राज योग में मुझे परम गति प्राप्त होगी। तब उसने अपना लक्ष्य विश्व विजेता का बना लिया और एक लक्ष्य को साथ लेकर चलने से रावण के साथ काफी संख्या में सारस्वत समाज के लोग जुट गए। जो निडर से उन्होंने रावण का साथ दिया और जो डरते थे वह दूर चले गए। लेकिन रावण ने अपनी मौत की कोई परवाह नहीं की। उन राजाओं से अपनी धरती माता को बचाने के लिए उसने विश्व विजेता की अलख जगाई। लेकिन रावण की विश्व विजेता की लहर के आगे अन्य राजा रावण के उसके पीछे गए। तब ब्रहा और शंकर ने रावण को प्रकांड विद्वान की पदवि देकर उसे समुद्र पार लंका का राजा बना दिया और उससे कहा कि आप वहां से इस ज्योति को जगाओ। रावण ने वहीं किया, लेकिन समुद्र पास साम्रज्य स्थापित करने के लिए रावण पर अन्य पाताल लोक के मानसों का दबाव आया तो रावण फिर ब्रहा और शंकर जी की शरण में गया, लेकिन अन्य राजाओं की सोच निम्न स्तर की थी। वह राजा तो थे लेकिन मरने से डरते थे। वह भी ब्रहा और शंकर की स्तुति करने लगे। लेकिन हम श्रेष्ठ बने। तब रावण ने भगवान ब्रहा और शंकर से कहा कि हेे भगवान आपने जो जिम्मेदारी मुझे दी है। उसका मैं पालन कर रहा हूँ, लेकिन अब मेरे ऊपर दबाव आ रहा है। पातल लोक के मानस मेरे पीछे पड़े हैं आप कुछ करो। तब उन्होंने सहयोग के लिए मना कर दिया क्यों कि यहां के राजाओं में फूट पड़ चुकी थी। तब राजाओं से भगवान ब्रहा और शंकर ने कहा कि आप रावण का सहयोग करें उसकी सोच विश्व विजेता कि है आप निम्न स्तर की सोच में डूबे हैं। तो वह कहने लगे कि हमें राजा बनना है तब भगवान ब्रह्मा और शंकर बोले हे राजाओं प्रत्येक प्राणी अपनी धरती का राजा है तब उनकी बात समझ नहीं आई निबुद्धि राजाओं ने रावण की विश्व विजेता की सोच को नीचे गिराने की कोशिश की तो रावण हठधर्मी हो गया और उसने उनकी एक बात भी नहीं मानी। रावण अपनी विश्व विजेता की सोच को लेकर लंका में चला गया। वहां वह विचार विमर्श करने लगा कि अब आगे क्या करना है। यह सब सहयोग करने के लिए मना कर रहे हैं। रावण को लगा कि ब्रहा और शंकर मुझे मेरे साथ छल कर रहे हैं और मुझे जो जिम्मेदारी लंका की दी है मैं अकेला उसे कैसे संभालूंगा। यह प्रश्न रावण के मन में घूमता रहा। इधर रावण का भगवान ब्रह्मा और शंकर से विश्वास उठ गया क्यों कि अन्य राजा रावण के विपरीत हो गए। जब किसी ने रावण का सहयोग नहीं किया तो रावण ने खुद अपने समाज के लोगों को एकत्रित कर विश्व विजेता की अलख पर अडिग रहा। चारों तरफ से रावण पर दबाव आना आंरभ हो गया। किसी ने रावण की मदद नहीं की तो भगवान ब्रह्मा और शंकर से प्राप्त की शक्तियों को रावण ने उन पर प्रहार करना आरंभ कर दिया। क्यों कि अन्य राजाओं ने रावण का पीछा करना आंरभ कर दिया।
यह देख भगवान ब्रहा और शंकर का आसन डोल गया। भगवान को बुरा लगा और उन्होंने राजाओं का सहयोग करना आंरभ कर दिया। तब भगवान ब्रह्मा और शंकर ने भगवान विष्णु को संकेत दिया कि आप किसी ये मानस को जगाओ जिससे यह हमारा पीछा करना बंद कर दे। तब हमारा आसन जमा रहेगा। नहीं तो जो इतिहास हमारा लिख रहा है फिर धरती पर रहने वाले प्राणी इसे ईश्वर मानकर पूजेंगे। हमारा प्राकृतिक खेल मिट जाएगा। हमें कोई नहीं जानेगा। तब भगवान विष्णु ने अवध में जाकर मंथरा के अंदर ज्ञान फूंक दिया। मंथरा ने दो वरदान राजा दशरथ से मांगे और राम को वनवास और छोटे को राज गद्दी। विष्णु भगवान को पता था कि वह राम बोलने में तेज है और छोटे को अभी ज्ञान नहीं है वह तब तक सीख जाएगा। इसलिए उसे गद्दी के संकेत देने के लिए मंथरा की जुबान से मांगने के लिए भगवान विष्णु ने कहे। जब राम को वनवास की जिम्मेदारी दी गई तो ऋषियों ने अपने क्रोध की ज्वाला रावण पर निकालनी आंरभ कर दी। राम को रावण की तरह मुंड मोडऩा आंरभ करना कर दिया। राम को इतने पर भी ज्ञान नहीं हुआ तब ऋषियों ने धीरे धीरे राम के अंदर ज्ञान फूंका और राम आगे बढ़े। राम को आगे बढ़ते देख रावण ने राम से मित्रता करनी चाहिए, लेकिन वह मित्रता तब तक राम के अंदर पूर्वजों की याद और अपने ऋषियों पर बढ़ते अत्याचार को लेकर ज्ञान फूंक चुके। संघर्ष शुरू हो गया और रावण अपने भाईयों में एकता न होने के कारण बाद में मारा गया। उसका कारण विभीषण था। लेकिन एक कारण यह भी है कि विश्व विजेता की सोच के आगे रावण मारा गया और अन्य कारण यह भी है कि ऋषियों के भविष्यवाणी कहीं गुन सही निकली। इसी कड़ी में एक कारण यह भी रहा है कि रावण ने अपना मार्ग खुद बनाया। अब प्रश्र यह उठता है कि कोई सारस्वत ब्राह्मण विश्व विजेता की अलख जगाता है, तो रावण की भांति भी अन्य राजा सारस्वत ब्राह्मण के विरूद्ध खड़े हो जाएंगे। अब प्रश्र फिर उठता है कि कोई अपनी जान की बाजी लगाकर विश्व विजेता भारत की धरती को बनने के लिए लक्ष्य सारस्वत ब्राह्मण उठाता भी है तो अन्य मूर्ख केवल राजा बनने के शौक पर आपका पीछा करना आरंभ कर देंगे। न तो खुद विश्व विजेता की अलख जगाएंगे और न ही किसी सारस्वत ब्राह्मण को अलख जगाने देंगे। अब फिर प्रश्न यह उठता है कि किसी सारस्वत ब्राह्मण ने विश्व विजेता की अलख अकेली जगानी शुरू कर दी और अन्य लोगों को साथ लेकर चलना आंरभ कर दिया, तो लोग मरने से डरेंगे और आपका साथ छोड़ देंगे। भारत की धरती पर केवल लोगों को खान मिल जाए यही उनकी सोच है। इसलिए हमारी भारत देश पिछड़ रहा है। इसलिए फिर वह व्यक्ति अपने सारस्वत ब्राह्मणों को रावण की भांति एकत्रित करेगा और अपनी मातृ भूमि की रक्षा करने के लिए रावण की भांति भी अंहकारी बनने के लिए मजबूर हो सकता है।

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